पहले डील फिर धमकी और अब अटैक, क्यों भड़के Trump
वॉशिंगटन। ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में वाणिज्यिक जहाजों पर हमला किया, और इसके जवाब में अमेरिका ने 80 से अधिक सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें बरसाने का दावा किया। पहली नजर में यह संघर्ष विराम तोड़ने पर अमेरिका की सीधी सैन्य प्रतिक्रिया लगती है, लेकिन इस कहानी का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू भी है जिस पर ध्यान देना आवश्यक है। डोनाल्ड ट्रंप ने जून में जिस संघर्ष विराम और समझौते को अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत बताया था, वही समझौता कुछ ही दिनों बाद उनके लिए राजनीतिक बोझ बन गया। उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी के कई बड़े नेताओं ने सवाल उठाए कि आखिर अमेरिका ने ईरान को इतनी रियायतें क्यों दीं। इस डील के तहत अमेरिका ने होर्मुज से नौसैनिक नाकाबंदी हटाने और ईरानी तेल पर अस्थायी राहत देने जैसी रियायतें दीं। बदले में ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलने का वादा किया। लेकिन इस डील के आलोचकों का कहना था कि ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल क्षमता या प्रॉक्सी नेटवर्क पर कोई ठोस कार्रवाई करने का वादा नहीं किया। इसने ही ट्रंप के लिए राजनीतिक मुश्किलें पैदा कर दीं। टॉम कॉटन, रोजर विकर, बिल कैसिडी, जॉन कॉर्निन और टेड क्रूज जैसे रिपब्लिकन नेताओं ने अलग-अलग शब्दों में इस समझौते पर सवाल उठाए। कुछ ने इसे अमेरिका की कमजोर सौदेबाजी बताया तो कुछ ने इसे अमेरिकी विदेश नीति का ब्लंडर कहा। वहीं कुछ ने कहा कि ईरान को बिना पर्याप्त कीमत चुकाए बड़ी राहत मिल गई।
फिर 6-7 जुलाई को ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तीन वाणिज्यिक जहाजों पर हमला कर दिया। इससे ट्रंप को न केवल सैन्य जवाब देने का कारण मिला, बल्कि राजनीतिक तौर पर भी अपनी छवि बदलने का एक बड़ा मौका मिल गया। मेरी राय में यहीं से पूरी तस्वीर बदलती है। अगर ट्रंप सिर्फ कूटनीतिक रास्ते पर चलते रहते, तो विपक्ष के साथ-साथ उनकी अपनी पार्टी के आलोचक भी उन्हें ‘ईरान के सामने झुकने वाला राष्ट्रपति’ बताने की कोशिश करते। लेकिन बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई करके उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि अमेरिका समझौता कर सकता है, लेकिन चुनौती मिलने पर अपनी ताकत दिखाने से पीछे नहीं हटेगा। इस हमले की टाइमिंग भी महत्वपूर्ण है। इसका मतलब यह नहीं है कि हमला सिर्फ घरेलू राजनीति के लिए किया गया। आधिकारिक कारण अब भी वही है जो अमेरिका कह रहा है - ईरान ने जहाजों पर हमला करके समझौते का उल्लंघन किया और अमेरिका ने जवाब दिया। लेकिन मेरी राय में ट्रंप ने इस मौके का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक साख मजबूत करने के लिए भी किया। इस राय को कुछ और बातें भी मजबूती देती हैं। ट्रंप ने यह ऑपरेशन नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान अपने शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों के साथ मीटिंग के बाद मंजूर किया। इसके तुरंत बाद उन्होंने संघर्ष विराम को ‘खत्म’ घोषित किया और बेहद सख्त बयान दिए। यह सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि एक शक्तिशाली राजनीतिक संदेश भी था।
हालांकि, हमला करके भी ट्रंप एक नई दुविधा में फंस गए हैं। एक तरफ उन्होंने ईरान को सैन्य जवाब देकर अपनी सख्त छवि दिखाने की कोशिश की, तो दूसरी तरफ अब नए सवाल उनके सामने खड़े हो गए हैं। डेमोक्रेट नेता और युद्ध विरोधी समूह आरोप लगा रहे हैं कि एक महीने से भी कम समय में संघर्ष विराम को खत्म कर उन्होंने पूरे क्षेत्र को फिर युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। दिलचस्प बात यह है कि सवाल सिर्फ विपक्ष नहीं उठा रहा। डोनाल्ड ट्रंप की पूर्व सहयोगी और पूर्व रिपब्लिकन सांसद मार्जोरी टेलर ग्रीन ने भी उनकी ईरान नीति पर निशाना साधा है। ग्रीन ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हमलों के बाद अमेरिका ने ईरान पर बमबारी की, जिससे तेल की कीमतें बढ़ने लगीं और शेयर बाजार में गिरावट आई।
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