Dark Mode
बचपन में Kubbra Sait को कहा जाता था ड्रामेबाज़ और बेपरवाह

बचपन में Kubbra Sait को कहा जाता था ड्रामेबाज़ और बेपरवाह

मुंबई। अपने बचपन के अनुभव साझा करते हुए बॉलीवुड अभिनेत्री कुब्रा सैत ने खुद खुलासा किया कि बचपन में उन्हें अक्सर ड्रामेबाज़ और बेपरवाह कहा जाता था, क्योंकि उनका मन अक्सर कल्पनाओं की एक अलग और जीवंत दुनिया में खोया रहता था। एक वीडियो में कुब्रा बेहद स्पष्टता से कहती हैं, बचपन में मुझे तीन बातें बार-बार सुनने को मिलती थीं, कुब्रा, तुम बहुत ड्रामेबाज़ हो, तुम्हारा ध्यान कहीं और रहता है, ज़रा ध्यान दो। जब बाकी बच्चे मैथ्स की क्लास में मुश्किल सवाल हल करने में जुटे होते थे, तब मेरा दिमाग अपने ही अंदाज में मर्डर मिस्ट्री की कहानी बुन रहा होता था, या मैं फिल्मफेयर अवॉर्ड जीतने पर अपनी काल्पनिक स्पीच की रिहर्सल कर रही होती थी। कभी-कभी मैं अपने भविष्य के पति और मां के बीच होने वाली बहस की कल्पना में डूब जाती थी, और लंच ब्रेक से पहले ही मैं अपने दिमाग में तीन आवारा बिल्लियों को बचा चुकी होती थी। यह बयान उनके बचपन की तीव्र कल्पनाशीलता और आंतरिक दुनिया को दर्शाता है, जो एडीएचडी का एक सामान्य लक्षण है। वह आगे बताती हैं कि बड़े होने पर जब उन्हें पता चला कि उन्हें एडीएचडी है, तभी उन्हें ज़िंदगी की कई बातें और उनके व्यवहार के पैटर्न समझ आने लगे। 


वे कहती हैं, अधूरे रह जाने वाले प्रोजेक्ट्स जो कभी पूरे नहीं हो पाते थे, किसी एक काम में घंटों तक पूरी तरह डूब जाना (हाइपरफोकस), ब्राउज़र में एक साथ 57 टैब खुले रखना, कमरे में क्यों आई थी यह भूल जाना, लेकिन 2009 में किसी ने क्या पहना था, किसने मेरी तारीफ की थी या किसने क्या कहा था, यह सब छोटी-छोटी बातें मुझे आज भी याद रहती थीं। ये सभी लक्षण एडीएचडी वाले व्यक्तियों के लिए सामान्य चुनौतियाँ हैं – एक तरफ अव्यवस्था और विस्मृति, तो दूसरी तरफ विशिष्ट विवरणों के लिए तीव्र स्मृति। एडीएचडी को एक चुनौती और एक अद्भुत ताकत दोनों बताते हुए कुब्रा कहती हैं, सच कहूँ तो यह थका देने वाला है, यह अक्सर अराजक हो सकता है, यह महंगा भी पड़ सकता है (जैसे आवेगपूर्ण खरीदारी के कारण), लेकिन यह एक सुपरपावर भी है। वह इस विरोधाभास को स्वीकार करती हैं कि जहाँ एडीएचडी अपने साथ कई व्यावहारिक कठिनाइयाँ लाता है, वहीं यह रचनात्मकता और अद्वितीय सोच के लिए एक उपजाऊ ज़मीन भी प्रदान करता है। 


वीडियो के अंत में अपने चिर-परिचित मज़ाकिया अंदाज़ में वह कहती हैं, मैंने तो सिर्फ एक मैसेज का जवाब देने के लिए फोन उठाया था, लेकिन पता ही नहीं चला कि कब यह पूरी रील बना डाली। लेकिन कंटेंट तो अच्छा बन गया! यह टिप्पणी खुद एडीएचडी के एक पहलू को दर्शाती है, जहाँ ध्यान भटकना या एक काम से दूसरे काम में सहजता से चले जाना आम है। अपनी इस ईमानदार और प्रेरणादायक बातचीत के ज़रिए कुब्रा सैत ने न्यूरोडायवर्सिटी के प्रति जागरूकता बढ़ाने का एक सशक्त संदेश दिया है। उन्होंने बताया कि एडीएचडी अपने साथ कई चुनौतियां लेकर आता है, लेकिन अगर इसे सही तरीके से समझा और अपनाया जाए, तो यही व्यक्ति की रचनात्मकता, कल्पनाशक्ति, नवीनता और दृढ़ता की सबसे बड़ी ताकत भी बन सकता है। 

Comment / Reply From

Newsletter

Subscribe to our mailing list to get the new updates!