सौदेबाजी करने चीन गए Trump की ताइवान के नाम पर बोलती बंद
- -जिनपिंग की एक दहाड़ पर ट्रंप बन गए भीगी बिल्ली
वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीजिंग दौरे के बाद दोनों देश अपने-अपने आधिकारिक बयान (रीडआउट) जारी कर चुके हैं, लेकिन एक ही मुलाकात को लेकर दुनिया के सामने दो बिल्कुल अलग-अलग तस्वीरें उभरकर सामने आई हैं। व्हाइट हाउस द्वारा जारी फैक्ट शीट में व्यापार, निवेश और ईरान जैसे बड़े मुद्दों पर समझौतों की लंबी सूची गिनाई गई है, जबकि ताइवान का कहीं जिक्र तक नहीं है। इसके विपरीत, चीन ने अपने संदेश में आर्थिक फायदों के बजाय रणनीति, सुरक्षा और ताइवान के मुद्दे को शीर्ष प्राथमिकता दी है। दोनों देशों के बयानों में यह विरोधाभास साफ दिखाता है कि अमेरिका जहां अपनी घरेलू जनता को इस यात्रा से हुए बड़े आर्थिक लाभ दिखाना चाहता था, वहीं चीन दुनिया को अपनी संप्रभुता और रणनीतिक संतुलन का संदेश देना चाहता था। कुल मिलाकर जिनपिंग के आगे ट्रंप की बोलती बंद रही। अमेरिका द्वारा जारी बयान के मुताबिक, दोनों देशों के बीच कई बड़े व्यापारिक समझौते हुए हैं। वाशिंगटन ने दावा किया कि चीन दुर्लभ खनिजों (जैसे यिट्रियम, स्कैंडियम और नियोडिमियम) की सप्लाई बढ़ाएगा, 200 अमेरिकी बोइंग विमान खरीदेगा और हर साल 17 अरब डॉलर के अमेरिकी कृषि उत्पादों का आयात करेगा। इसके अलावा, अमेरिका की 400 से अधिक बीफ यूनिट्स को मंजूरी देने और पोल्ट्री आयात फिर से शुरू करने की बात भी कही गई। हालांकि, चीन के आधिकारिक बयान में बोइंग विमानों, वित्तीय आंकड़ों या बीफ आयात का कोई सीधा जिक्र नहीं किया गया, बल्कि केवल सामान्य तौर पर सप्लाई चेन स्थिर रखने और कृषि सहयोग बढ़ाने की बात कही गई। इसके अतिरिक्त, अमेरिका ने उत्तर कोरिया के पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण का दावा किया, जबकि चीन के बयान में उत्तर कोरिया का नाम तक शामिल नहीं था। दूसरी ओर, चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बयान में ताइवान को सबसे संवेदनशील और अहम मुद्दा बताया गया।
चीन ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि ताइवान मामले में किसी भी गलत कदम से दोनों महाशक्तियों के बीच सीधा टकराव हो सकता है। चीन ने चार तरह की स्थिरता (सकारात्मक, स्वस्थ, निरंतर और स्थायी) का हवाला देते हुए रणनीतिक संतुलन पर विस्तार से बात की, जबकि अमेरिका ने अपने बयान में ताइवान का नाम पूरी तरह गायब रखा। इसके अलावा, चीन ने पीपुल-टू-पीपुल एक्सचेंज के तहत 50,000 अमेरिकी नागरिकों को चीन आमंत्रित करने जैसे ठोस कार्यक्रम की बात कही, जिस पर अमेरिका ने केवल सामान्य टिप्पणी की। ईरान और वैश्विक सुरक्षा के मोर्चे पर भी दोनों के सुर अलग दिखे। अमेरिका ने दावा किया कि दोनों देश इस बात पर सहमत हैं कि ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए और होर्मुज जलडमरूमध्य बिना किसी टोल के खुला रहेगा। वहीं चीन ने केवल सामान्य बातचीत और युद्धविराम का समर्थन किया। हालांकि, इन भारी मतभेदों के बावजूद, कुछ अहम मुद्दों पर दोनों महाशक्तियां एकमत दिखीं। दोनों देशों ने आर्थिक संबंधों को संभालने के लिए यूएस-चीन बोर्ड ऑफ ट्रेड और यूएस-चीन बोर्ड ऑफ इन्वेस्टमेंट बनाने पर सहमति जताई है। साथ ही, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के आगामी अमेरिका दौरे की पुष्टि की गई है और जी-20 व एपेक जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक-दूसरे का सहयोग करने की प्रतिबद्धता जताई गई है।
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