अमेरिकी बेड़े के सबसे शक्तिशाली युद्धपोत Gerald R. Ford में लगी भीषण आग
न्यूयार्क। ईरान के साथ जारी भीषण तनाव और युद्ध के बीच अमेरिका के सबसे आधुनिक और शक्तिशाली विमानवाहक पोत यूएसएस जेराल्ड आर फोर्ड की सुरक्षा व्यवस्था और तकनीकी मजबूती पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। हाल ही में इस युद्धपोत के लॉन्ड्री एरिया में लगी आग ने देखते ही देखते विकराल रूप धारण कर लिया, जो करीब 30 घंटे से अधिक समय तक धधकती रही। इस घटना ने न केवल जहाज को भारी नुकसान पहुँचाया है, बल्कि अमेरिकी नौसेना की आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली की पोल भी खोल कर रख दी है। हालात इतने चुनौतीपूर्ण हो गए कि जहाज के अंदरूनी हिस्सों में धुआं और आग फैलने के कारण 600 से अधिक अमेरिकी सैनिकों को अपने रहने के स्थान छोड़ने पड़े। इन जवानों को मजबूरी में फर्श और टेबल पर सोकर रातें गुजारनी पड़ रही हैं। वर्तमान में इस विशालकाय युद्धपोत को मरम्मत के लिए ग्रीस के क्रीट द्वीप की ओर भेजा गया है। एक हाई-टेक वॉर मशीन माने जाने वाले इस पोत में इतने लंबे समय तक आग का काबू में न आना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऑटोमैटिक फायर सिस्टम ने समय पर काम किया होता, तो आग को शुरुआती चरणों में ही रोका जा सकता था। इस घटना ने चीन जैसे प्रतिस्पर्धी देशों को अमेरिका की सैन्य कमजोरी पर टिप्पणी करने का मौका दे दिया है। चीनी विशेषज्ञों का तर्क है कि आधुनिक युद्धपोतों का डिजाइन इस तरह होता है कि आग एक हिस्से से दूसरे हिस्से में न फैले, लेकिन जेराल्ड फोर्ड के मामले में प्रबंधन और डिजाइन दोनों ही विफल नजर आए। यह भी अंदेशा जताया जा रहा है कि चालक दल की ट्रेनिंग या प्रतिक्रिया समय में भारी कमी रही है। वहीं, इस आगजनी के पीछे के कारणों को लेकर भी कयासों का बाजार गर्म है।
यह युद्धपोत पिछले 10 महीनों से लगातार समुद्र में तैनात है, जबकि सामान्य तैनाती 6 महीने की होती है। लंबे समय तक घर से दूर रहने और युद्ध के दबाव के कारण सैनिकों में भारी थकान और मानसिक तनाव देखा जा रहा है। सोशल मीडिया पर ऐसी अपुष्ट खबरें भी तैर रही हैं कि क्या त्रस्त नाविकों ने जानबूझकर आग लगाई ताकि जहाज को मरम्मत के बहाने वापस अमेरिका भेज दिया जाए। हालांकि, अमेरिकी नौसेना ने इन दावों की पुष्टि नहीं की है और मामले की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। गौरतलब है कि इससे पहले भी इस जहाज पर तकनीकी गड़बड़ियां और बुनियादी सुविधाओं के अभाव की खबरें सामने आती रही हैं।
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