एच-1बी वीजा शुल्क रद्द होने पर White House ने किया ट्रंप का बचाव
अदालती फैसले को चुनौती देने की तैयारी
वाशिंगटन। अमेरिकी संघीय अदालत द्वारा 1 लाख डॉलर का एच-1बी वीजा शुल्क रद्द किए जाने के बाद व्हाइट हाउस ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का पुरजोर बचाव किया है। अदालत ने इस भारी-भरकम वीजा शुल्क को यह कहते हुए अमान्य कर दिया कि ट्रंप प्रशासन ने अपनी अधिकार सीमा से बाहर जाकर काम किया और नियोक्ताओं पर एक तरह का गैर-कानूनी टैक्स थोप दिया। अदालत के इस फैसले के बाद व्हाइट हाउस की प्रवक्ता टेलर रोजर्स ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि राष्ट्रपति के पास किसी भी श्रेणी के विदेशियों के प्रवेश को रोकने का स्पष्ट और मजबूत कानूनी अधिकार है, जिन्हें वे अमेरिका के सर्वोत्तम हित में नहीं मानते हैं और उन्होंने देशहित में ठीक यही कदम उठाया है। प्रवक्ता ने आगे कहा कि एच-1बी प्रोग्राम का दशकों से दुरुपयोग हो रहा था और राष्ट्रपति ट्रंप ने आखिरकार इसे ठीक करने के लिए कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि वाशिंगटन में एक फेडरल जज पहले ही लगभग ऐसे ही एक आदेश को सही ठहरा चुके हैं, इसलिए प्रशासन को पूरा भरोसा है कि ऊपरी अदालत में अपील करने पर यह नया आदेश पलट दिया जाएगा। हालांकि, व्हाइट हाउस ने अभी यह साफ नहीं किया है कि वह इस फैसले के खिलाफ कब अपील दायर करेगा, लेकिन प्रशासन के अधिकारियों ने संकेत दिया है कि वे इस नीति का बचाव करना जारी रखेंगे क्योंकि यह एच-1बी प्रोग्राम पर निगरानी कड़ी करने की राष्ट्रपति की व्यापक कोशिशों का एक मुख्य हिस्सा है। व्हाइट हाउस की यह प्रतिक्रिया मैसाचुसेट्स के अमेरिकी जिला न्यायाधीश लियो टी. सोरोकिन द्वारा इस विवादित नीति को पूरे देश में रद्द करने के कुछ घंटों बाद आई है।
अपने कड़े शब्दों वाले फैसले में न्यायाधीश सोरोकिन ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी कांग्रेस की अनुमति के बिना यह मनमाना टैक्स लगाया है। जज ने अपने फैसले में लिखा कि यह पॉलिसी कांग्रेस की ओर से जरूरी अधिकार दिए बिना एच-1बी याचिकाओं पर टैक्स लगाती है। ऐसी कोई विधायी शक्तियां मौजूद नहीं हैं जो प्रतिवादियों को एच-1बी याचिकाओं पर एक लाख डॉलर का भारी शुल्क लागू करने का अधिकार देती हों। अदालत ने प्रशासन की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया कि इमिग्रेशन कानून के तहत राष्ट्रपति की व्यापक शक्तियां इस फीस को लागू करने की अनुमति देती हैं। इस अदालती फैसले ने विशेष रूप से सितंबर 2025 में राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से हस्ताक्षरित उस उद्घोषणा के कानूनी आधार को बड़ी चुनौती दी है, जिसमें नई एच-1बी याचिकाएं दाखिल करने वाले नियोक्ताओं को अतिरिक्त एक लाख डॉलर का भुगतान करना अनिवार्य किया गया था। अदालत ने इस नीति को जमीन पर लागू करने वाली सरकारी एजेंसियों की कार्यप्रणाली की भी कड़ी आलोचना की है।
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