
America से रक्षा, तकनीक व व्यापार में बढ़ा सहयोग, टैरिफ पर तनाव क्यों?
भारत की रूस और चीन के साथ बढ़ती नजदीकियों से अमेरिका चिंतित
वाशिंगटन। भारत और अमेरिका के बीच संबंध हमेशा से ही जटिल लेकिन रणनीतिक साझेदारी का हिस्सा रहे हैं। एक तरफ दोनों देश रक्षा, तकनीक और व्यापार में सहयोग बढ़ा रहे हैं, तो दूसरी तरफ ट्रंप प्रशासन के ट्रेड एडवायजर पीटर नवारो की तीखी बयानबाजी और भारत पर लगाए गए 25 फीसदी टैरिफ ने दोनों देशों के रिश्तों में तनाव पैदा कर दिया है। अब सवाल उठता है कि जब अमेरिका भारत को एक मजबूत सहयोगी मानता है, तो फिर यह टैरिफ वाली नफरत क्यों? मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत और अमेरिका के बीच रिश्ते पिछले कुछ दशकों में अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुए हैं। पीएम मोदी के कई अमेरिकी दौरे और दोनों देशों के बीच रक्षा, तकनीक और व्यापार में बढ़ते सहयोग ने भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक अहम साझेदार बनाया है। 2024-25 में अप्रैल से अगस्त तक अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है, जिसके साथ 53 अरब डॉलर का व्यापार हुआ। यह आंकड़ा दर्शाता है कि दोनों देश आर्थिक रूप से एक-दूसरे के लिए कितने अहम हैं। अमेरिका की ट्रंप सरकार ने भी जुलाई 2025 में भारत के साथ एक अंतरिम व्यापार समझौते की बात कही थी, जिसे दोनों देशों के बीच लॉन्ग टर्म आर्थिक साझेदारी की दिशा में एक कदम माना गया है, फिर भी उसी ट्रंप सरकार के सलाहकार पीटर नवारो भारत को टैरिफ का महाराजा और क्रेमलिन के लिए लॉन्ड्रोमैट जैसे तीखे शब्दों से नवाज रहे हैं। पीटर नवारो जो ट्रंप के अमेरिका फर्स्ट नीति के प्रमुख रणनीतिकार माने जाते हैं उन्होंने भारत की टैरिफ नीतियों और रूस के साथ ऊर्जा संबंधों पर कड़ा रुख अपनाया है। नवारो का आरोप है कि भारत रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदकर उसे रिफाइन कर मुनाफा कमा रहा है, जिससे रूस को यूक्रेन युद्ध में आर्थिक मदद मिल रही है। उन्होंने भारत को यूक्रेन युद्ध को बढ़ावा देने वाला बताया। इसके जवाब में अमेरिका ने भारत पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ भी लगाया है, जिससे कुल टैरिफ 50फीसदी तक पहुंच गया है। नवारो की यह आलोचना उस समय आई जब भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रूस के साथ ऊर्जा संबंधों का बचाव करते हुए कहा कि भारत की तेल खरीद वैश्विक ऊर्जा बाजारों को स्थिर करने में मदद करती है और यह अमेरिका के अनुरोध पर ही शुरू हुई थी। यह दोहरा रवैया अमेरिकी नीति की जटिलता को उजागर करता है, खासकर जब चीन, जो रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार है, ऐसी कोई सख्त कार्रवाई नहीं की गई।
पीटर नवारो का भारत के प्रति यह रुख केवल व्यापार घाटे या रूसी तेल की खरीद तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा जियो-पॉलिटिकल डर है। भारत की रूस और चीन के साथ बढ़ती नजदीकियां अमेरिका के लिए चिंता का विषय हैं। नवारो ने भारत को शी जिनपिंग के साथ नजदीकी बढ़ाने का आरोप भी लगाया है, जो अमेरिका की चीन को घेरने की रणनीति के लिए खतरा बन सकता है। रूस-यूक्रेन के बीच शांति की राह पीटर नवारो भारत को लेकर स्टैंड बदलते भी रहे हैं। उन्होंने पीएम मोदी की तारीफ भी की है। नवारो का कहना है कि रूस-यूकेन के बीच शांति का रास्ता भारत से होकर गुजरता है। बता दें कई मौकों पर रूस और यूक्रेन के बीच शांति की बात कर चुका है। साथ ही इसमें एक्टिव भूमिका निभाने का ऑफर भी दे चुका है। भारत की विदेश नीति ने उसे वैश्विक मंच पर एक मजबूत खिलाड़ी बनाया है। रूस से तेल खरीद और चीन के साथ बढ़ता व्यापार भारत की आर्थिक और कूटनीतिक ताकत को दर्शाता है। यह स्थिति अमेरिका को डराती है कि यदि भारत, रूस और चीन का त्रिकोणीय गठजोड़ मजबूत हुआ, तो वैश्विक शक्ति संतुलन में अमेरिका की स्थिति कमजोर पड़ सकती है।
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