Pakistan के गुप्त परमाणु नेटवर्क को लेकर फ्रांस का आईएसआई से बढ़ गया था टकराव
- गोपनीय रहस्यों का पता लगाने के लिए फ्रांसीसी जासूसों को खुली छूट दी गई थी
पेरिस। फ्रांस की खुफिया एजेंसी डीजीएसई पाकिस्तान के गुप्त परमाणु नेटवर्क और उत्तर कोरिया से उसके संदिग्ध रिश्तों पता लगाने में जुटी थी, जिसके परिणामस्वरूप पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ उसका टकराव बढ़ गया। पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के जनक अब्दुल कदीर खान के अंतरराष्ट्रीय जाल को काटने के लिए फ्रांसीसी जासूसों को खुली छूट दी गई थी। इस संवेदनशील ऑपरेशन में एक फ्रांसीसी एजेंट के रेडिएशन की चपेट में आने का मामला भी सामने आया, जिसने सुरक्षा संबंधी गंभीर चिंताएं पैदा कर दीं।
पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर फ्रांस की खुफिया एजेंसी डीजीएसई काफी सतर्क थी, क्योंकि अब्दुल कदीर खान का नेटवर्क सिर्फ पाकिस्तान तक सीमित नहीं था, बल्कि उनके अंतरराष्ट्रीय संपर्कों और उत्तर कोरिया के साथ पाकिस्तान के परमाणु संबंधों को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चिंता थी। तत्कालीन डीजीएसई इंटेलिजेंस प्रमुख पैट्रिक कालवर ने अपने अधिकारियों को पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े गोपनीय रहस्यों का पता लगाने की खुली छूट दी थी, जिसके बाद फ्रांसीसी एजेंटों ने अपने प्रयास तेज कर दिए। उनकी गतिविधियां जल्द ही पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के रडार पर आ गईं, और कराची में तैनात फ्रांस के एक अधिकारी को पाकिस्तान से निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद आईएसआई की बेहद गोपनीय एस विंग ने फ्रांसीसी एजेंटों पर निगरानी बढ़ा दी।
इसी दौरान, फ्रांसीसी एजेंट जेरोम के रेडिएशन के संपर्क में आने का मामला सामने आया। कुछ सुरक्षा सूत्रों ने इस घटना और पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के भीतर एक अहम सूत्र की भर्ती के बीच संबंध होने की आशंका जताई, हालांकि इस पर कोई एकमत नहीं है। इस मामले का एक और अहम पहलू रेडियोधर्मी सामग्री से जुड़ा था, जिसे फ्रांसीसी खुफिया एजेंसी को एक ऑपरेशन के दौरान मिला था। इसे सुरक्षित तरीके से संभालना बेहद जरूरी था, क्योंकि इसके अनजाने में फैलने से एजेंसी के कर्मचारियों और कार्यालयों के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता था। उस समय खुफिया एजेंसी के कार्यालयों में सुरक्षा जांच की व्यवस्था आज जैसी सख्त नहीं थी, जिससे रेडियोधर्मी सामग्री के गलती से फैलने की आशंका ने सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ा दी थीं। यह पूरा मामला पाकिस्तान के परमाणु नेटवर्क, उसके संबंधों और अंतरराष्ट्रीय खुफिया एजेंसियों के बीच चल रही खींचतान की ओर इशारा करता है, जहां फ्रांस के लिए चुनौती सिर्फ परमाणु तकनीक के संभावित प्रसार पर नजर रखना नहीं, बल्कि अपने एजेंटों और संवेदनशील ठिकानों की सुरक्षा करना भी था।
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