Nirav Modi का दांव: प्रत्यर्पण से बचने के लिए यूरोपीय मानवाधिकार अदालत में लगाई याचिका
लंदन। पंजाब नेशनल बैंक के हजारों करोड़ रुपये के घोटाले के मुख्य आरोपी और भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी ने भारत प्रत्यर्पण से बचने के लिए अब अपनी अंतिम कानूनी चाल चली है। ब्रिटेन की अदालतों में अपील की सभी राहें बंद होने के बाद, नीरव मोदी ने स्ट्रासबर्ग स्थित यूरोपीय मानवाधिकार अदालत का दरवाजा खटखटाया है। यह कदम तब उठाया गया है जब लंदन की हाई कोर्ट ने 25 मार्च 2026 को उसकी अपील दोबारा खोलने की याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया था। नीरव मोदी पर पीएनबी के साथ लगभग 6,498 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी करने का संगीन आरोप है। वर्ष 2018 में घोटाले का खुलासा होने के बाद वह देश छोड़कर ब्रिटेन भाग गया था, जहाँ 2019 में उसे गिरफ्तार किया गया था। यद्यपि 2021 में वहां की निचली अदालत ने उसे भारत को सौंपने का आदेश दिया था, लेकिन वह लगातार कानूनी अपीलों के जरिए प्रत्यर्पण की प्रक्रिया को लटकाता रहा है। अब ईसीएचआर में याचिका दाखिल करने का उद्देश्य प्रत्यर्पण पर अंतरिम रोक हासिल करना है, जिससे उसे कुछ समय की और मोहलत मिल सकती है। हालिया कानूनी कार्यवाही के दौरान नीरव मोदी के वकीलों ने एक अजीबोगरीब दावा पेश किया था।
उन्होंने दलील दी थी कि यदि उसे भारत भेजा गया, तो जांच एजेंसियां पूछताछ के दौरान उसके साथ टॉर्चर और अमानवीय व्यवहार कर सकती हैं। इस तर्क को पुख्ता करने के लिए उसने पिछले कुछ अदालती मामलों और विशेषज्ञों की गवाही का भी सहारा लिया। हालांकि, भारत सरकार ने इन आरोपों का कड़ा खंडन किया और अदालत को लिखित आश्वासन दिया कि नीरव मोदी की जांच पूरी हो चुकी है और अब केवल न्यायिक ट्रायल शेष है। यूके हाई कोर्ट ने भारत सरकार के राजनयिक आश्वासनों को पर्याप्त माना और स्पष्ट किया कि प्रत्यर्पण की राह में अब कोई कानूनी बाधा नहीं है। कोर्ट ने माना कि भारत द्वारा दिए गए सुरक्षा और निष्पक्ष सुनवाई के वादे विश्वसनीय हैं। पीएनबी घोटाले ने भारत के बैंकिंग तंत्र की साख पर गहरा आघात किया था, और जांच एजेंसियां लंबे समय से मोदी की संपत्ति जब्त करने और उसे वापस लाने के प्रयास में जुटी हैं। अब सबकी नजरें यूरोपीय मानवाधिकार अदालत के फैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि करोड़ों के गबन का यह आरोपी कब भारतीय कानून के शिकंजे में होगा।
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