सऊदी अरब के इनकार ने Trump की निकाली हेकड़ी, बढ़ेंगी मुश्किलें
- अमेरिका के प्रोजेक्ट फ्रीडम पर लगा ब्रेक
रियाद। पश्चिम एशिया में अपने दबदबे को पुनर्जीवित करने की कोशिशों में जुटे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक बड़ा कूटनीतिक और सैन्य झटका लगा है। होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) को ईरानी नियंत्रण से मुक्त कराने और जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने के लिए शुरू किया गया अमेरिकी सैन्य अभियान ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ महज 36 घंटे के भीतर ही रोकना पड़ा है। हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप ने इस मिशन को रोकने का श्रेय पाकिस्तान और अन्य देशों के साथ चल रही शांति वार्ता को दिया है, लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, इस मिशन के अचानक रुकने की मुख्य वजह पाकिस्तान का आग्रह नहीं, बल्कि अमेरिका के सबसे भरोसेमंद सहयोगी सऊदी अरब का सख्त रुख है। बताया जा रहा है कि ट्रंप प्रशासन ने इस सैन्य ऑपरेशन का ऐलान करने से पहले खाड़ी देशों को पूरी तरह भरोसे में नहीं लिया था। जब रविवार को अचानक इस मिशन की शुरुआत हुई, तो क्षेत्रीय सहयोग के अभाव में स्थितियां बिगड़ गईं। सबसे बड़ा झटका तब लगा जब सऊदी अरब ने स्पष्ट कर दिया कि वह अपने प्रिंस सुल्तान एयरबेस से अमेरिकी लड़ाकू विमानों को उड़ान भरने की इजाजत नहीं देगा। इसके साथ ही सऊदी अरब ने अपने हवाई क्षेत्र (एयरस्पेस) के इस्तेमाल पर भी रोक लगा दी। बिना सऊदी अरब की भौगोलिक और सामरिक मदद के, ईरान के प्रभाव वाले इस क्षेत्र में किसी भी बड़े सैन्य ऑपरेशन को अंजाम देना अमेरिका के लिए लगभग असंभव था।
सूत्रों के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के बीच फोन पर लंबी बातचीत भी हुई, लेकिन सऊदी अरब अपने रुख पर कायम रहा, जिसके बाद वॉशिंगटन को मजबूरी में पीछे हटना पड़ा। ऑपरेशन प्रोजेक्ट फ्रीडम के शुरुआती घंटों में अमेरिका ने दो जहाजों को निकालने में सफलता जरूर हासिल की थी और भारी सैन्य साजो-सामान भी तैनात किया था। लेकिन अमेरिकी सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि सहयोगी देशों के बेस और एयरस्पेस के बिना जहाजों को एस्कॉर्ट करना और हवाई सुरक्षा सुनिश्चित करना जोखिम भरा काम है। अपनी फजीहत से बचने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप ने बाद में यह बयान जारी किया कि पाकिस्तान और अन्य मध्यस्थों के अनुरोध पर बातचीत के लिए समय दिया गया है। फिलहाल, होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही पर संकट बरकरार है और अमेरिका इस समझौते की तलाश में है जो उसकी सैन्य प्रतिष्ठा को बचा सके।
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