SpaceX के स्टारशिप वी-3 रॉकेट का सफल परीक्षण
नासा बोला- चांद और मंगल के एक कदम और करीब
वॉशिंगटन। एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने अंतरिक्ष की दौड़ में एक और बड़ी छलांग लगाते हुए दुनिया के सबसे बड़े रॉकेट स्टारशिप के तीसरे वर्जन (वी-3) का सफल परीक्षण कर लिया है। इस ऐतिहासिक कामयाबी को देखकर अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा भी बेहद उत्साहित है। नासा ने इस परीक्षण की सराहना करते हुए इसे ‘चांद के एक कदम और करीब, मंगल के भी एक कदम और करीब’बताया है। हालांकि, परीक्षण के दौरान रॉकेट को जब समुद्र में उतारा गया, तो वह एक जोरदार धमाके के साथ फट गया, लेकिन इसके बावजूद शनिवार को हुए फ्लाइट-12 टेस्ट को नासा के बड़े अधिकारियों ने अंतरिक्ष मिशनों के लिए एक बेहद बड़ी और महत्वपूर्ण सफलता करार दिया है। नासा एडमिनिस्ट्रेटर जैरेड आइजैकमैन ने इस लॉन्चिंग की तस्वीरें साझा करते हुए इसे अमेरिकी अंतरिक्ष अभियानों के लिए एक मील का पत्थर बताया। स्टारशिप का यह नया वी3 वर्जन सिर्फ एक सामान्य परीक्षण नहीं था, बल्कि इसमें कई बड़े तकनीकी बदलाव किए गए हैं। नासा के मुताबिक, इस नए वर्जन में रॉकेट की विश्वसनीयता बढ़ाने, ज्यादा वजन ले जाने की क्षमता विकसित करने और इसके दोबारा इस्तेमाल को और बेहतर करने जैसी महत्वपूर्ण खूबियों पर विशेष काम किया गया है। यही तीनों चीजें नासा के आगामी आर्टेमिस चंद्रमा मिशन और भविष्य में तय किए जाने वाले मंगल ग्रह के अभियानों के लिए सबसे अहम मानी जा रही हैं।
नासा की मुख्य योजना यह है कि स्टारशिप का उपयोग ह्यूमन लैंडिंग सिस्टम के तौर पर किया जाए। इसका सीधा मतलब यह है कि आर्टेमिस-3 मिशन और उसके बाद के अभियानों में यही स्पेसक्राफ्ट अंतरिक्ष यात्रियों को सुरक्षित रूप से चंद्रमा की सतह तक लेकर जाएगा। नासा काफी लंबे समय से आर्टेमिस मिशन के जरिए इंसानों को फिर से चांद पर भेजने की तैयारी में जुटा है, ऐसे में स्टारशिप वी3 का यह सफल टेस्ट इस पूरे मिशन को एक नई और तेज रफ्तार देता हुआ दिखाई दे रहा है। अंतरिक्ष एजेंसी का कहना है कि स्टारशिप की टेस्टिंग के दौरान अब हॉट स्टेजिंग, बूस्टर पर्फॉर्मेंस और ऑर्बिट ऑपरेशन जैसे कई अत्यंत जटिल और महत्वपूर्ण लक्ष्य सफलतापूर्वक पूरे हो रहे हैं। हालांकि अभी इस रॉकेट की पूरी रीयूजेबिलिटी और इंसानों को लेकर उड़ान भरना बाकी है, लेकिन हर नए टेस्ट के साथ यह सिस्टम वास्तविक इस्तेमाल के बेहद करीब पहुंच रहा है। नासा ने स्पष्ट किया है कि स्टारशिप सिर्फ चांद तक ही सीमित नहीं रहने वाला है। अगर यह सिस्टम पूरी तरह से कामयाब साबित होता है, तो आने वाले समय में यही तकनीक मंगल ग्रह पर इंसान को भेजने वाले ऐतिहासिक मिशन की मुख्य रीढ़ बनेगी।
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