फिल्म ‘Hanuman Ansh’ दर्शकों का ध्यान खींच रही सिनेमाघरों में
मुंबई। फिल्म ‘हनुमान अंश’ इन दिनों सिनेमाघरों में दर्शकों का ध्यान खींच रही है। बाबा नीम करौली के जीवन पर आधारित इस फिल्म को शुरुआत में सीमित स्क्रीन मिली थीं, लेकिन दूसरे और तीसरे सप्ताह में दर्शकों की बढ़ती रुचि के चलते कई जगह इसके प्रदर्शन के लिए स्क्रीन बढ़ानी पड़ीं। फिल्म की सफलता को बाबा नीम करौली के अनुयायी उनके जीवन से जुड़े चमत्कारों की परंपरा से जोड़कर देख रहे हैं। बाबा नीम करौली का वास्तविक नाम लक्ष्मीनारायण शर्मा बताया जाता है। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में हुआ था। बचपन से ही उनका झुकाव आध्यात्मिक जीवन की ओर था। मां के निधन के बाद उनके भीतर वैराग्य की भावना और गहरी हो गई।
बाबा के जीवन से जुड़े कई प्रसंग आज भी उनके अनुयायियों के बीच श्रद्धा के साथ सुनाए जाते हैं। उनसे जुड़ा सबसे चर्चित प्रसंग ट्रेन की घटना का है। बताया जाता है कि एक बार फर्रुखाबाद के पास ट्रेन में सफर के दौरान टिकट नहीं होने पर एक साधु को नीम करौली गांव के पास उतार दिया गया। इसके बाद ट्रेन आगे नहीं बढ़ी। रेलवे कर्मचारियों ने काफी प्रयास किया, लेकिन ट्रेन नहीं चली। मान्यता है कि बाद में बाबा को दोबारा ट्रेन में बैठने का अनुरोध किया गया और उनके सवार होते ही ट्रेन चल पड़ी। इसी घटना के बाद उन्हें नीम करौली बाबा के नाम से पहचान मिली। अमेरिकी लेखक रामदास की पुस्तक ‘मिरिकल ऑफ लव’ में भी इस प्रसंग का उल्लेख मिलता है। बाबा नीम करौली ने अपने जीवनकाल में कई हनुमान मंदिरों की स्थापना कराई। उत्तराखंड का कैंची धाम उनके सबसे प्रसिद्ध आश्रमों में शामिल है। यह स्थान आज देश-विदेश के श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र बन चुका है। एप्पल के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स और फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग भी कैंची धाम से प्रभावित रहे हैं।
कैंची धाम से जुड़ा एक अन्य प्रसिद्ध प्रसंग वार्षिक भंडारे का है। श्रद्धालुओं के अनुसार, एक बार भंडारे के दौरान घी की कमी हो गई थी। तब बाबा ने शिप्रा नदी से पानी लाने को कहा। मान्यता है कि उस पानी से भी पूड़ियां तैयार हो गईं। हालांकि इन घटनाओं को श्रद्धालु आध्यात्मिक चमत्कार मानते हैं, इनके वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। बाबा नीम करौली की शिक्षाओं में प्रेम, सेवा, भक्ति और अहंकार त्यागने पर विशेष जोर दिया जाता था। उनके संदेशों में जरूरतमंदों को भोजन कराने और लोगों की सेवा करने की भावना प्रमुख थी। आज भी कैंची धाम में सेवा और भंडारे की परंपरा जारी है।
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