ईरान के दोस्त पर बम गिराने को क्यों बेकरार है Pakistan?
- मक्का समझौते ने बढ़ाई इस्लामाबाद की मुश्किलें
इस्लामाबाद। पश्चिम एशिया में लगातार गहराते तनाव और सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों के ताबड़तोड़ हमलों ने पाकिस्तान की रणनीतिक स्थिति को कटघरे में खड़ा कर दिया है। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के ऊर्जा बुनियादी ढांचे को निशाना बनाए जाने के बाद, अब यह आशंकाएं तेज हो गई हैं कि पाकिस्तान इस संघर्ष में सीधे तौर पर उलझ सकता है। हाल ही में हुए त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौते के तहत पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के बयानों ने साफ संकेत दिए हैं कि इस्लामाबाद यमन में हूती ठिकानों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने पर विचार कर रहा है।
पिछले महीने 7 अगस्त को सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान के बीच एक महत्वपूर्ण त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौता हुआ था, जिसे मक्का समझौता या इस्लामिक नाटो भी कहा जाता है। इस समझौते की सबसे अहम शर्त यह है कि यदि तीनों देशों में से किसी एक पर भी सैन्य हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा और सामूहिक रक्षा के नियम लागू होंगे। मंगलवार को हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर ड्रोन और मिसाइल से बड़े हमले किए, जिसमें कम से कम 73 लोग घायल हो गए। इसके जवाब में सऊदी अरब ने यमन के विभिन्न हिस्सों में 30 से अधिक हवाई हमले किए हैं। चूंकि हूती विद्रोही ईरान समर्थित माने जाते हैं, इसलिए इस घटनाक्रम ने ईरान के साथ अच्छे कूटनीतिक संबंध रखने वाले पाकिस्तान के लिए एक बड़ी दुविधा पैदा कर दी है।
पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने स्थानीय मीडिया से बात करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि यमन का संघर्ष सऊदी अरब की सीमाओं के भीतर जारी रहता है, तो त्रिपक्षीय समझौते की शर्तें स्वतः लागू हो जाएंगी। उन्होंने कहा, इसमें कोई शक नहीं है कि हम इस समझौते की शर्तों से बंधे हैं, और जरूरत पड़ने पर हम उनका पालन करेंगे। सैन्य सूत्रों के हवाले से यह भी चर्चा है कि पाकिस्तान जल्द ही मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट को अमल में लाते हुए यमन के सादाह और अन्य इलाकों में हूती विद्रोहियों के खिलाफ हवाई हमले कर सकता है, जिससे पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक समीकरण और अधिक जटिल हो सकता है।
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