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  • Monday, 26 January 2026
70 से अधिक International Organizations से अलग हुआ अमेरिका, ट्रंप का ईगो बना अहम कारण

70 से अधिक International Organizations से अलग हुआ अमेरिका, ट्रंप का ईगो बना अहम कारण

अभी अभी विश्व स्वास्थ्य संगठन से अलग होने की प्रक्रिया पूरी हुई

वाशिंगटन। अमेरिका ने औपचारिक रूप से विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से अलग होने की प्रक्रिया पूरी कर ली है, जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के पहले दिन का एक बड़ा कदम था। इस निर्णय के परिणामस्वरूप, अमेरिका करीब 78 साल पुरानी संस्था से अलग हो गया है। ट्रंप प्रशासन के इस निर्णय से डब्ल्यूएचओ को काफी नुकसान हो सकता है, क्योंकि अमेरिका लंबे समय से संगठन का सबसे बड़ा दानदाता रहा है। इसके अलावा, अमेरिका पर अभी भी डब्ल्यूएचओ के 130 मिलियन डॉलर से ज्यादा बकाया हैं। यह कदम वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है, खासकर नई बीमारियों और महामारियों से निपटने के संदर्भ में। डब्ल्यूएचओ की भूमिका वैश्विक स्वास्थ्य संकटों के समाधान में महत्वपूर्ण रही है। संगठन ने इबोला, पोलियो और एमपॉक्स जैसी बीमारियों से निपटने के लिए वैश्विक प्रयासों को समन्वित किया है और गरीब देशों को तकनीकी सहायता और दवाओं के वितरण में मदद की है। इसके बाद अमेरिका का डब्ल्यूएचओ से अलग होना वैश्विक स्वास्थ्य संकटों से निपटने की क्षमता को कमजोर कर सकता है। इसके अलावा, अमेरिकी वैज्ञानिकों और दवा कंपनियों के लिए नए टीके और दवाओं के विकास में भी मुश्किलें आ सकती हैं। जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के पब्लिक हेल्थ लॉ एक्सपर्ट लॉरेंस गोस्टिन ने इस अपने जीवनकाल का सबसे विनाशकारी राष्ट्रपति फैसला बताया है। अमेरिका का डब्ल्यूएचओ से बाहर जाना केवल स्वास्थ्य क्षेत्र तक सीमित नहीं है। ट्रंप प्रशासन ने 66 से अधिक अंतरराष्ट्रीय संगठनों से भी नाता तोड़ने का निर्णय लिया है। इसमें 31 संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी संस्थाएं और 35 गैर-यूएन संगठन शामिल हैं। इनमें से कई संस्थाएं जलवायु परिवर्तन, प्रवासन, और विविधता जैसे मुद्दों पर काम कर रही थीं, जिन्हें ट्रंप प्रशासन ने वोक एजेंडा मानते हुए अमेरिका के हितों के खिलाफ करार दिया है।

अमेरिका का यह कदम वैश्विक सहयोग और संकट समाधान की दिशा में एक गंभीर चुनौती प्रस्तुत करता है। इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन ने पेरिस जलवायु समझौते से भी अमेरिका को बाहर निकालने का ऐलान किया था। यह निर्णय 27 जनवरी 2026 से लागू होगा, जिसके बाद अमेरिका कार्बन उत्सर्जन में कमी करने के किसी कानूनी दायित्व से मुक्त होगा। यह कदम वैश्विक पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को कमजोर कर सकता है, क्योंकि पेरिस समझौते को एक महत्वपूर्ण वैश्विक पर्यावरणीय पहल माना जाता है। इसके साथ ही, यूएनएफसीसीसी (संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन) से भी अमेरिका की सदस्यता समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। हालांकि, ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका कुछ महत्वपूर्ण संस्थाओं जैसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) और शरणार्थी एजेंसी यूएनएचआरसी का सदस्य बना रहेगा। इन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवीय हितों के लिए आवश्यक माना गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिकी सरकार कुछ बुनियादी अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को बनाए रखने का प्रयास करेगी, जबकि कई अन्य संस्थाओं से नाता तोड़ लिया जाएगा। समाप्त होने वाली यह प्रक्रिया और इसके परिणाम वैश्विक स्तर पर सुरक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़े सहयोग पर महत्वपूर्ण असर डाल सकते हैं। हालांकि, यह कदम अमेरिका के आंतरिक हितों को प्राथमिकता देता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए यह एक बड़ा चुनौती है।

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