लगातार काम करने का असर पडता है काम की गुणवत्ता पर: Ashutosh Rana
मुंबई। फिल्म इंडस्ट्री में काम के घंटों को लेकर छिड़ी बहस अभी समाप्त नहीं हुई है। इस मामले में वरिष्ठ अभिनेता आशुतोष राणा ने अपनी राय रखते हुए दीपिका पादुकोण का समर्थन किया है और 8 घंटे की शिफ्ट को न सिर्फ सही बल्कि जरूरी बताया है। आशुतोष राणा ने एक बातचीत में कहा कि किसी भी क्रिएटिव काम को जरूरत से ज्यादा खींचना ठीक नहीं है। उनके मुताबिक, अगर किसी कलाकार या तकनीशियन से बेहतरीन आउटपुट की उम्मीद की जाती है तो उसके लिए उसकी ऊर्जा, मानसिक स्थिति और शारीरिक क्षमता का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने कहा कि यह समझना होगा कि क्रिएटिव प्रोसेस को 8 घंटे के भीतर सीमित करना अपने आप में एक चुनौती है, लेकिन अगर यह संभव हो पा रहा है और नतीजा अच्छा आ रहा है तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता। उन्होंने आगे कहा कि तय सीमा से बाहर जाकर लगातार काम करने का सीधा असर काम की गुणवत्ता पर पड़ता है। हर इंसान की क्षमता अलग होती है और यह उम्मीद करना कि कोई व्यक्ति रोजाना 18 से 20 घंटे काम करे और फिर भी पूरी ऊर्जा के साथ परफॉर्म करे, व्यवहारिक नहीं है। कभी-कभार किसी खास परिस्थिति में लंबे घंटे काम करना अलग बात है, लेकिन अगर यही सिलसिला बन जाए तो इससे न केवल शारीरिक थकान बढ़ती है बल्कि क्रिएटिविटी भी प्रभावित होती है। आशुतोष राणा का मानना है कि काम में ईमानदारी दोनों तरफ से होनी चाहिए। अगर निर्माता कलाकारों को सही मेहनताना देते हैं और उनके साथ न्याय करते हैं, तो कलाकारों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे पूरे मन और पूरी ऊर्जा के साथ काम करें।
लेकिन थकी हुई हालत में किया गया काम किसी के साथ न्याय नहीं कर सकता, न खुद कलाकार के साथ और न ही उस किरदार के साथ जिसे वह निभा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि सही आराम और रिकवरी का समय मिलना बेहद जरूरी है, ताकि कलाकार अपने किरदार में पूरी तरह डूब सकें और दर्शकों को एक यादगार अनुभव दे सकें। आशुतोष राणा के इस बयान के बाद 8 घंटे की ड्यूटी शिफ्ट को लेकर चल रही बहस को एक नया और संतुलित नजरिया जरूर मिला है। बता दें कि दीपिका पादुकोण की 8 घंटे की ड्यूटी शिफ्ट को लेकर शुरू हुई बहस अभी थमी नहीं है। फिल्म इंडस्ट्री में काम के घंटों को लेकर छिड़ी इस चर्चा में जहां कुछ लोग दीपिका के फैसले को पूरी तरह सही ठहरा रहे हैं, वहीं कुछ का मानना है कि फिल्ममेकिंग जैसे क्रिएटिव फील्ड में समय की ऐसी सीमाएं व्यवहारिक नहीं हैं।
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