अगर दूसरे देशों के पास मिसाइलें हैं तो ईरान के पास मिसाइलें होना गलत नहीं: Trump
न्यूयार्क। अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में शुरू हुई बातचीत को बड़ी कूटनीतिक सफलता बताया जा रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि जिन मुद्दों को लेकर युद्ध शुरू हुआ था, उन पर आज भी कोई स्पष्ट सहमति नहीं बन पाई है। कुछ मुद्दों पर बातचीत तो हो भी रही है लेकिन ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल को तो बातचीत की लिस्ट से ही बाहर कर दिया गया है जो नेतन्यहू का बड़ा मकसद था। मसलन सबसे बड़ा विवाद ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को लेकर है। वहीं अब ट्रंप कह रहे हैं कि अगर दूसरे देशों के पास मिसाइलें हैं तो ईरान के पास भी कुछ मिसाइलें होना गलत नहीं है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक युद्ध की शुरुआत में अमेरिका और इजराइल ने दावा किया था कि तेहरान की मिसाइल क्षमता क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है और इसे खत्म करना उनके प्रमुख मकसद में शामिल है, लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ ने साफ कहा है कि अमेरिका-ईरान समझौते में मिसाइल कार्यक्रम का कोई जिक्र नहीं है और यह मुद्दा कभी बातचीत की मेज पर नहीं था।
ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने भी दो टूक कहा कि उनका देश अपने मिसाइल कार्यक्रम पर किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा। उनका कहना है कि यही मिसाइलें ईरान की सुरक्षा की गारंटी हैं और अगर ये नहीं होतीं तो अमेरिका और इजराइल ईरान के साथ भी वही करते जो गाजा में हुआ। दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप भी अब अपने पुराने रुख से पीछे हट रहे हैं। अप्रैल में जहां वॉशिंगटन का लक्ष्य ईरान की मिसाइल क्षमता को नष्ट करना बताया गया था, वहीं अब ट्रंप कह रहे हैं कि अगर दूसरे देशों के पास मिसाइलें हैं तो ईरान के पास भी कुछ मिसाइलें होना गलत नहीं है। परमाणु कार्यक्रम का मुद्दा भी अब तक अनसुलझा है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु ठिकानों पर अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण की अनुमति दे और परमाणु हथियार विकसित न करने की गारंटी दे। दूसरी तरफ तेहरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। दोनों पक्षों के बीच अविश्वास अब भी बरकरार है। होर्मुज स्ट्रेट को लेकर भी हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हैं। अमेरिका इसे खुला और सुरक्षित रखना चाहता है क्योंकि दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। वहीं ईरान बार-बार यह संकेत देता रहा है कि वह इस रणनीतिक मार्ग पर अपना प्रभाव बनाए रखेगा।
इस पूरी तस्वीर में इजराइल सबसे बड़ी बाधा है। अमेरिका क्षेत्रीय संघर्ष खत्म करने की बात कर रहा है, लेकिन इजराइल अब भी दक्षिणी लेबनान से सेना हटाने को तैयार नहीं दिख रहा। वह हिज्बुल्लाह के पूरी तरह निशस्त्रीकरण को अपनी शर्त बना चुका है यानी वॉशिंगटन और तेल अवीव की प्राथमिकताओं में भी अंतर दिखाई दे रहा है।बता दें स्विट्जरलैंड में अगले 60 दिनों के अंदर अंतिम समझौते की कोशिश होगी, लेकिन मौजूदा हालात बताते हैं कि न मिसाइल मुद्दे पर सहमति बनी है, न परमाणु विवाद सुलझा है, न होर्मुज को लेकर भरोसा कायम हुआ है और न ही इजराइल पूरी तरह अमेरिकी रणनीति के साथ खड़ा है। ऐसे में फिलहाल युद्ध टला जरूर है, लेकिन यह कहना मुश्किल है कि यह विराम कुछ हफ्तों का है, कुछ महीनों का या फिर किसी नई टकराव की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है।
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