हवा में ही चार्ज होंगे ड्रोन, बदलेगी निगरानी और डिलीवरी की दुनिया, China ने विकसित की लेजर से ऊर्जा देने वाली तकनीक
बीजिंग। ड्रोन तकनीक के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। चीन के वैज्ञानिकों ने ऐसी प्रणाली विकसित की है, जिसमें उड़ते हुए ड्रोन को जमीन पर उतारे बिना ही लेजर बीम के जरिए ऊर्जा दी जा सकती है। इस तकनीक के सफल होने पर ड्रोन लंबे समय तक लगातार उड़ान भर सकेंगे और बार-बार बैटरी चार्ज करने की जरूरत कम हो जाएगी। इस नई प्रणाली को चीन की सिविल एविएशन यूनिवर्सिटी और सिंगहुआ यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने विकसित किया है। वैज्ञानिकों ने एक छोटे ड्रोन के नीचे विशेष रिसीवर लगाया, जो सौर पैनल की तरह काम करता है। इस रिसीवर पर हरे रंग की उच्च-शक्ति वाली लेजर किरण डाली गई, जिसे उसने प्रकाश ऊर्जा से विद्युत ऊर्जा में बदल दिया। इस ऊर्जा से ड्रोन के प्रोपेलर को चलाने में सफलता मिली।
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह सिस्टम लेजर से मिलने वाली ऊर्जा का करीब 38.5 प्रतिशत हिस्सा बिजली में बदलने में सक्षम रहा है। इसे लेजर आधारित वायरलेस पावर ट्रांसफर तकनीक के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। हालांकि, शुरुआती परीक्षणों में वैज्ञानिकों के सामने कई चुनौतियां भी आईं। तेज लेजर किरण के कारण ड्रोन का रिसीवर 80 से 90 डिग्री सेल्सियस तक गर्म हो गया, जिससे सिस्टम की कार्यक्षमता प्रभावित हुई। इस समस्या को दूर करने के लिए रिसीवर में विशेष सेमीकंडक्टर नैनोक्रिस्टल का इस्तेमाल किया गया, जिससे गर्मी को नियंत्रित करने में मदद मिली। इसके अलावा, ड्रोन के प्रोपेलर से पैदा होने वाली हवा ने भी कूलिंग में योगदान दिया। अगर यह तकनीक पूरी तरह विकसित हो जाती है तो इसका इस्तेमाल कई क्षेत्रों में किया जा सकता है। जंगलों की लंबे समय तक निगरानी, प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत और बचाव अभियान, सैन्य निगरानी और लंबी दूरी तक सामान पहुंचाने जैसे कामों में ऐसे ड्रोन बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं।
फिलहाल यह तकनीक शुरुआती चरण में है और इसे वास्तविक परिस्थितियों में बड़े पैमाने पर परीक्षण की जरूरत है। सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि उड़ते हुए ड्रोन पर लेजर किरण को लगातार और बेहद सटीक तरीके से केंद्रित रखा जा सके। दुनिया के अन्य देश भी इस दिशा में काम कर रहे हैं। अमेरिका की रक्षा अनुसंधान संस्थाओं ने भी लंबी दूरी तक लेजर के जरिए ऊर्जा भेजने के प्रयोग किए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह तकनीक सफल होती है तो भविष्य में ड्रोन की क्षमता में बड़ा बदलाव आएगा और वे पहले से अधिक लंबे, जटिल और लगातार चलने वाले मिशन पूरे कर सकेंगे।
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