New experiment: संगीत की धुनों पर थिरककर गायें देती हैं ज्यादा दूध
- -गोकुलम गोशाला में संगीत की प्रस्तुति देने आते हैं देशभर के कलाकार
नई दिल्ली। संगीत इंसान को तो प्रभावित करता ही है, वहीं जानवर भी कम शौकीन नहीं होते हैं। केरल की एक गोशाला की गायों के बारे में तो एक अद्भुत जानकारी सामने आई है। यहां की गाएं संगीत की इतनी दीवानी हैं कि देशभर से कलाकार इन्हें गीत-संगीत सुनाने आते हैं। कोई हारमोनियम बजाकर तो कोई किसी माध्यम से गायों को मधुर संगीत सुनाता है। इसे लेकर अध्ययन भी किया गया है और पाया कि गायें सुमधुर संगीत सुनने के बाद ज्यादा दूध देती हैं। यहां की गोशाला में गायों के संगीत सुनने के कई वीडियोज यूट्यूब पर पड़े हैं। 2001 में एक शोध में पाया गया कि गायों को आरामदेह संगीत, जैसे साइमन एंड गार्फंकेल का ब्रिज ओवर ट्रबलड वाटर, सुनाने से उनके दूध देने में 3प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। प्रिटोरिया यूनिवर्सिटी के एक शोध में इसी साल की शुरुआत में ये पाया गया कि जब गायों को दिन-रात हल्का संगीत सुनाया जाता है, तो उन्हें एक बार के दुहन में दो लीटर तक ज्यादा दूध मिलता है।
केरल के बेकल के पास पेरिया में स्थित गोकुलम गोशाला कोई दूध बेचने का धंधा नहीं करती, बल्कि गायों का संरक्षण केन्द्र है। इसलिए, जब वे गायों के लिए संगीत का आयोजन करते हैं, तो ये गायें बस आराम से आनंद लेती हैं। मंगलुरु से लगभग 70 किलोमीटर दूर स्थित इस गोशाला को ज्योतिषी विष्णु प्रसाद और उनकी कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएचडी करने वाली पत्नी नागरत्ना हेगड़े चलाते हैं। उनके यहां आने वाले कलाकारों की सूची में भारतीय शास्त्रीय संगीत के बड़े-बड़े नाम हैं। नागरत्ना कहती हैं कि हम हर महीने एक लाइव शास्त्रीय संगीत कार्यक्रम आयोजित करते हैं। वायलिन वादक एल सुब्रह्मण्यम, गायक अभिषेक रघुराम, और प्लेबैक सिंगर हरीहरन और अनूप शंकर जैसे कई प्रसिद्ध कलाकार मवेशियों के बीच अपनी प्रस्तुति देते हैं। उन्होंने बताया कि इन मासिक संगीत कार्यक्रमों के अलावा इस साल दिवाली पर गोशाला ने भारी मांग के चलते 10 दिन का संगीत समारोह भी आयोजित किया था। गौशाला चलाने वालीं नागरत्ना केरल के कसारगोड के सेंट्रल यूनिवर्सिटी में पर्यावरण रसायन की असिस्टेंट प्रोफेसर हुआ करती थीं। उन्हें यह पता है कि शास्त्रीय संगीत सुनने से गायों का दूध बढ़ता है। पर वो बताती हैं कि वो अपने गोशाला के दूध को बेचती नहीं हैं।
वो दूध सिर्फ बछड़ों के पालन-पोषण के लिए रखा जाता है। नागरत्ना कहती हैं, हमने देखा है कि हमारे मवेशियों को भैरवी राग खासा पसंद है। जबकि वाद्य यंत्रों में गायें बांसुरी की तान अधिक पसंद करती हैं, जो भगवान कृष्ण से जुड़ी है। इस साल, जन्माष्टमी पर बांसुरी वादक जयंत हमारे यहां आए थे। हमें देखकर हैरानी हुई कि जैसे ही उन्होंने चरागाह में बांसुरी बजाई, न सिर्फ मवेशी उनके पास आ गए, बल्कि कुछ ने तो अपने खुरों से ताल भी मिलाई। इस अद्भुत पल का वीडियो सोशल मीडिया पर देखते ही वायरल हो गया। नागरत्ना ने कहा कि हम एक अहम सिद्धांत का पालन करते हैं, वो है नस्ल की शुद्धता बनाए रखना। इसलिए, हम आर्टिफिसियल गर्भाधान जैसी प्रक्रियाओं से बचते हैं। हर नस्ल का प्रतिनिधित्व एक गाय और एक बैल की ओर से किया जाता है। संरक्षण से आगे गोकुलम गोशाला विभिन्न मूल्यवान उप-उत्पादों के उत्पादन का केंद्र भी है, जैसे कि दंतमंजन, साबुन, गोमूत्र अर्का आदि। नागरत्ना ने आयुर्वेद और पंचगव्य या पांच गो-उत्पादों दूध, मूत्र, गोबर, घी और दही के पारंपरिक उपयोगों का अध्ययन किया है।
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