Nepal में दुश्मनी भुलाकर दोस्त बनेंगे Oli and Prachanda
- बालेन शाह के डर से बदल रहे समीकरण
काठमांडु। नेपाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा उलटफेर होता दिख रहा है, जहां सालों तक एक-दूसरे के सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे केपी शर्मा ओली और पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ अब फिर करीब आ रहे हैं। दोनों नेताओं के बीच लगातार बातचीत चल रही है और संकेत मिल रहे हैं कि जल्द ही वामपंथी दलों का एक नया गठबंधन बन सकता है। यह सवाल हर किसी के मन में है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि सत्ता के लिए एक-दूसरे से भिड़ने वाले ये दो नेता फिर से साथ आने को तैयार हो गए? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इसकी सबसे बड़ी वजह सिर्फ सत्ता की लालसा नहीं, बल्कि नेपाल की बदलती राजनीतिक परिस्थितियां और नए प्रधानमंत्री बालेन शाह का बढ़ता दबदबा है।
बालेन शाह के सत्ता में आने के बाद से पुराने नेताओं की मुश्किलें बढ़ गई हैं, क्योंकि उनकी सरकार बड़े नेताओं की संपत्ति और भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करा रही है। ऐसे में ओली और प्रचंड को लगने लगा है कि अगर वे अलग-अलग रहे तो उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है, और एकजुट होकर ही वे इस नई चुनौती का सामना कर सकते हैं। हालांकि, उनका यह गठबंधन कितने दिन चल पाएगा, यह देखने वाली बात होगी, क्योंकि उनका इतिहास काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। केपी शर्मा ओली, एक गरीब परिवार से उठकर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे, जिन्होंने कम्युनिस्ट आंदोलन के दौरान 14 साल जेल में बिताए। वह धीरे-धीरे यूएमएल के सबसे ताकतवर नेता बने और उन्हें बेहद चालाक, जिद्दी और हमेशा अपनी शर्तों पर खेलने वाला माना जाता है। भारत विरोधी नेता के तौर पर इनकी छवि बनी हुई है। दूसरी ओर, पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ ने 10 सालों तक हिंसक माओवादी आंदोलन चलाया और 2006 में शांति समझौते के बाद राजनीति में आ गए। आज भी उनकी इमेज एक ऐसे नेता की है जो कभी भी पाला बदल सकते हैं। हालांकि, ओली और प्रचंड में एक बात कॉमन है कि दोनों सत्ता चाहते हैं, और इसी सत्ता के लिए वे कभी दोस्त तो कभी दुश्मन बनते रहे हैं।
उनकी दोस्ती और दुश्मनी का इतिहास काफी पुराना है। 2015 में नेपाल का नया संविधान बना और दोनों जानते थे कि अकेले लड़कर नहीं जीत सकते। ओली और प्रचंड पहली बार 2017 में साथ आए, जिसका फायदा हुआ और उन्होंने दो तिहाई बहुमत हासिल कर लिया। गठबंधन का फॉर्मूला था कि ढाई साल केपी ओली और ढाई साल पुष्प कमल दहल प्रचंड पीएम बनेंगे। यह प्लान सुनने में जितना अच्छा था, उतना जमीन पर लागू नहीं हो पाया। 2018 में दोनों दलों का विलय हो गया और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी बनी। लेकिन ओली को सत्ता का सुख इतना अच्छा लगा कि उन्होंने दहल को किनारे करना शुरू कर दिया, कैबिनेट में दहल के लोगों को कम महत्व मिला, पार्टी के फैसले भी ओली अकेले लेने लगे और दहल को पीएम भी नहीं बनने दिया। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने पार्टी का विलय खत्म कर दिया।
दूसरी बार वे 2022 में साथ आए, लेकिन तब उनकी दोस्ती 2 महीने भी नहीं चली। दरअसल, 2022 के चुनाव में दोनों अलग-अलग लड़े और दोनों कमजोर हुए। दहल को लगा कि ओली के बिना सरकार नहीं बनेगी, लेकिन बाद में दहल ने 2 महीने बाद नेपाली कांग्रेस के साथ मिलकर ओली को हटा दिया और खुद पीएम बन गए। ओली को यह विश्वासघात लगा और रिश्तों में कड़वाहट आ गई। अब एक बार फिर, बालेन शाह के बढ़ते प्रभाव के कारण, सिर्फ ओली और प्रचंड ही नहीं, बल्कि दोनों दलों के कई बड़े नेता भी लगातार संपर्क में हैं। राज्य सरकारों में तालमेल, संविधान की रक्षा और साझा रणनीति जैसे मुद्दों पर बातचीत चल रही है। 28 जून को मदन भंडारी की 75वीं जयंती पर होने वाले एक कार्यक्रम में ओली और प्रचंड लंबे समय बाद एक ही मंच पर नजर आएंगे। इसे दोनों नेताओं के रिश्तों में आई नई नरमी का एक बड़ा संकेत माना जा रहा है। यह कार्यक्रम पब्लिक को यह संदेश देगा कि दोनों साथ हैं और उनके काडर को कम्युनिस्ट एकता फिर से बनने का मैसेज मिलेगा, साथ ही सरकार को भी चेतावनी होगी कि उसे मिलकर घेरा जाएगा।
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