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  • Thursday, 05 November 2026
सपा का दलित दांव: महापंचायतों से दिलित समाज में पैठ मजबूत करने का फार्मूला, Akhilesh आगरा से करेंगे महापंचायत की शुरुआत

सपा का दलित दांव: महापंचायतों से दिलित समाज में पैठ मजबूत करने का फार्मूला, Akhilesh आगरा से करेंगे महापंचायत की शुरुआत

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी (सपा) दलित वोट बैंक को अपने पाले में लाने के लिए एक बड़ा अभियान छेड़ रही है। इस कवायद के तहत, सपा अब दलित महापंचायतों के जरिए दलित मतदाताओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करेगी। इस अभियान का आगाज 15 नवंबर को आगरा से होगा, जहां सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव एक विशाल महापंचायत को संबोधित करेंगे। इसे अगले विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी का पहला बड़ा चुनावी शक्ति प्रदर्शन माना जा रहा है। अखिलेश यादव आगामी चुनाव में सभी जातियों को पार्टी से जोड़ने के लिए लगातार बैठकें और जिलों का दौरा कर रहे हैं।
आगरा को इस महापंचायत के लिए चुनने का विशेष कारण है, क्योंकि आगरा और इसके आसपास के जिलों में 50 लाख से अधिक दलित मतदाता हैं, जो चुनाव परिणामों पर सीधा असर डालने की क्षमता रखते हैं। सपा ने इस महत्वपूर्ण अभियान की कमान राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ दलित नेता रामजी लाल सुमन को सौंपी है। महापंचायत में संविधान और आरक्षण बचाने जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया जाएगा, जैसा कि लोकसभा चुनाव 2024 में भी सपा और कांग्रेस ने इन्हीं मुद्दों को प्रमुखता से उठाया था और पार्टी को इसका राजनीतिक फायदा भी मिला था। अब विधानसभा चुनाव से पहले सपा इसी रणनीति के जरिए दलित मतदाताओं को फिर से जोड़ने की कोशिश में है।
आगरा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहां जाटव समुदाय की बड़ी आबादी है और यह क्षेत्र लंबे समय तक बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का एक मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। अकेले आगरा में ही 9 लाख से अधिक दलित वोट हैं, जबकि अलीगढ़, हाथरस और फिरोजाबाद जैसे पड़ोसी जिलों में भी दलित मतदाताओं की संख्या निर्णायक भूमिका निभाती है। सपा की यह रणनीति सिर्फ दलित वोट बैंक में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पार्टी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सामाजिक समीकरण को भी चुनौती देना चाहती है।
इसके लिए दलित संतों के सम्मान, पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को खास तवज्जो दी जा रही है। पिछले कुछ वर्षों से सपा ने दलित नेताओं को संगठन और चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी हैं। इसके अलावा, बसपा के कई बड़े नेताओं को भी पार्टी में शामिल कराया गया है। लोकसभा चुनाव 2024 में सुरक्षित सीटों के साथ-साथ सामान्य सीटों पर भी दलित प्रत्याशियों को उतारकर एक नया प्रयोग किया गया था, जिसका लाभ पार्टी को मिला। अब आगामी विधानसभा चुनाव में भी इसी सफल रणनीति को आगे बढ़ाने की तैयारी है, ताकि दलित मतदाताओं का विश्वास जीता जा सके और पार्टी अपनी स्थिति को और मजबूत कर सके।

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