महिला जिहादी कमांडर Khadra Isa की तलाश तेज, 48 करोड़ का है इनाम
- अमेरिका का आरोप- महिलाओं को इस्लामिक स्टेट की विचारधारा की शिक्षा दी
वाशिंगटन। अमेरिका ने सीरिया में सक्रिय एक महिला जिहादी कमांडर खदरा ईसा की तलाश तेज कर दी है, जिसके लिए 50 लाख अमेरिकी डॉलर यानी लगभग 48 करोड़ रुपए का इनाम घोषित किया है। सोमालिया में जन्मी और डच नागरिक बताई जाने वाली खदरा ईसा को अमेरिकी एजेंसियों की वांटेड सूची में शामिल किया गया है, जहां उसे ‘उम्म कका अल-सोमाली’ के नाम से जाना जाता है। अमेरिकी विदेश विभाग ने उस पर यह इनाम अप्रैल 2025 में की गई पिछली घोषणा के बाद दोबारा बढ़ाया है। अमेरिकी एजेंसियों के मुताबिक खदरा ईसा का संबंध इस्लामिक स्टेट से जुड़े एक महिला संगठन ‘खतीबा नुसायबा’ से रहा है। उसे इस संगठन में महिलाओं को धार्मिक और वैचारिक प्रशिक्षण देने वाली प्रमुख शरिया प्रशिक्षक के तौर पर देखा जाता है। अमेरिका का आरोप है कि ईसा ने इस्लामिक स्टेट की चरमपंथी विचारधारा की शिक्षा दी, जो आत्मघाती अभियानों और नागरिकों की हत्या को उचित ठहराती थी। उसने महिला सदस्यों की भर्ती की और ऐसे आदेश दिए जिनके परिणामस्वरूप कई हमले और हत्याएं हुईं।
विदेश विभाग के नोटिस में दावा किया है कि उसने एक ऐसे समूह का नेतृत्व किय। आतंकवादी संगठनों में महिलाओं की भूमिका हमेशा एक समान नहीं रही है। लंबे समय तक महिलाओं को मुख्य रूप से आत्मघाती हमलों या सामान ले जाने जैसे अभियानों में इस्तेमाल किया जाता था, जहां सुरक्षा जांच से बचने की संभावना अधिक होती थी। बता दें लेबनान में सना मेहैदली और भारत के पूर्व पीएम राजीव गांधी को निशाना बनाने वाली एलटीटीई की सदस्य धनु जैसे कई उदाहरण हैं। बोको हराम ने भी बड़ी संख्या में महिला आत्मघाती हमलावरों का इस्तेमाल किया था।
अमेरिकी का आरोप है कि उसकी भूमिका केवल किसी अभियान में हिस्सा लेने तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसे महिलाओं को वैचारिक और धार्मिक प्रशिक्षण देने, सदस्यों की भर्ती करने और संगठनात्मक गतिविधियों में भी अहम भूमिका निभाने वाली महिला के रूप में पेश किया गया है। इस्लामिक स्टेट ने 2014 में अल-खंसा ब्रिगेड का गठन कर महिलाओं को निगरानी और संगठन की विचारधारा के अनुरूप सामाजिक नियंत्रण बनाए रखने जैसी जिम्मेदारी दी थी। खदरा ईसा पर अमेरिका की कार्रवाई इसलिए भी अहम है क्योंकि यह उन बदलावों पर रोशनी डालती है, जिनके तहत आतंकी संगठन महिलाओं को अपनी संरचना में अधिक औपचारिक और रणनीतिक जिम्मेदारियां देने लगे हैं, उन्हें सिर्फ मोहरा नहीं बल्कि वैचारिक और संगठनात्मक भागीदार बना रहे हैं।
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