पाषाण काल से AI युग तक बांस का महत्व नहीं हुआ है कम
नई दिल्ली। पाषाण काल से लेकर आधुनिक एआई युग तक बांस इंसानों की जरूरतों का हिस्सा रहा है। दुनिया आज माइक्रोचिप, स्मार्टफोन, सुपरकंप्यूटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक पहुंच चुकी है, लेकिन बांस आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना पूर्व में होता था। विश्व बांस दिवस के अवसर पर इसकी उपयोगिता और महत्व को समझना इसलिए भी खास है, क्योंकि आज इसे टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल संसाधन के रूप में देखा जा रहा है। वैज्ञानिक रूप से बांस पेड़ नहीं, बल्कि घास परिवार का एक विशाल पौधा है। यह पोएसी परिवार से संबंधित है। तेजी से बढ़ने, मजबूत होने और लचीलेपन के कारण इसे कई जगह ‘ग्रीन गोल्ड’ कहा जाता है। एशिया, अफ्रीका और अमेरिका सहित दुनिया के कई हिस्सों में इसकी विभिन्न प्रजातियां पाई जाती हैं। मानव सभ्यता के शुरुआती दौर में बांस का इस्तेमाल औजार, हथियार और रहने के लिए अस्थायी ढांचे तैयार करने में किया जाता था। खेती का विकास होने के बाद इसका उपयोग पानी पहुंचाने वाले पाइप और अन्य कृषि उपकरण बनाने में भी होने लगा। समय के साथ बांस का इस्तेमाल घर, पुल, टोकरी, फर्नीचर और दैनिक जीवन की कई दूसरी वस्तुओं में होने लगा। आज तकनीक के दौर में भी बांस की उपयोगिता खत्म नहीं हुई है।
इसके रेशों से आधुनिक फाइबर, पर्यावरण अनुकूल उत्पाद और निर्माण सामग्री तैयार की जा रही है। बांस आधारित फर्नीचर, लैपटॉप स्टैंड, सजावटी वस्तुएं और टिकाऊ वास्तुकला इसके आधुनिक इस्तेमाल के उदाहरण हैं। तेजी से बढ़ने वाला यह पौधा टिकाऊ विकास और हरित निर्माण की चर्चाओं में भी जगह बना रहा है। भारतीय जीवन में बांस का संबंध कई सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं से भी है। घरों और फर्नीचर से लेकर शादी-ब्याह के मंडप तक इसका इस्तेमाल होता है। कई क्षेत्रों में जन्म से जुड़े पारंपरिक अवसरों पर भी बांस से बनी वस्तुओं का उपयोग किया जाता है। वहीं जीवन के अंतिम पड़ाव पर भी इसकी भूमिका दिखाई देती है। सनातन परंपरा में अंतिम यात्रा के लिए बनाई जाने वाली अर्थी मुख्य रूप से बांस से तैयार की जाती है। पर्यावरण के लिहाज से भी बांस को महत्वपूर्ण माना जाता है। इसकी तेज वृद्धि के कारण यह बड़ी मात्रा में कार्बन को अवशोषित और अपने जैविक हिस्सों में संग्रहित कर सकता है।
बांस आधारित निर्माण सामग्री का इस्तेमाल कुछ परिस्थितियों में सीमेंट और स्टील जैसी अधिक ऊर्जा-गहन सामग्रियों के विकल्प के तौर पर किया जा सकता है। इससे टिकाऊ निर्माण को बढ़ावा देने की संभावना है। बांस की उपयोगिता केवल परंपरा और पर्यावरण तक सीमित नहीं है। इसके वैश्विक बाजार का आकार भी लगातार बढ़ रहा है। उपलब्ध बाजार अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2025 में वैश्विक बांस बाजार का आकार करीब 70 से 76 अरब डॉलर के बीच था और आने वाले वर्षों में इसके और बढ़ने का अनुमान है। चीन और भारत इसके प्रमुख उत्पादक देशों में शामिल हैं। इस तरह पाषाण काल के साधारण औजारों से लेकर आधुनिक डिजाइन और टिकाऊ तकनीक तक बांस ने समय के साथ अपना स्वरूप बदला है, लेकिन इसकी उपयोगिता बनी हुई है।
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