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Children बोलने-चलने से पहले ही दिखाने लगते हैं चालाकियां

Children बोलने-चलने से पहले ही दिखाने लगते हैं चालाकियां

लंदन। बच्चे बोलना या ठीक से चलना सीखने से पहले ही छोटे-छोटे झूठ या चालाकियां दिखाने लगते हैं। हाल ही में इंसानों के व्यवहार को लेकर की गई एक नई रिसर्च ने चौंकाने वाले तथ्य सामने रखे हैं। यह निष्कर्ष यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टोल के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में सामने आया है, जिसने मानव व्यवहार को लेकर नई बहस छेड़ दी है। यह अध्ययन प्रोफेसर इलेना हाइका के नेतृत्व में किया गया। रिसर्च के दौरान ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा के 750 से अधिक माता-पिता से बातचीत की गई। उनसे पूछा गया कि उनके छोटे बच्चे किस तरह के व्यवहार दिखाते हैं और किस उम्र में धोखे जैसी आदतें दिखाई देने लगती हैं। अध्ययन में पाया गया कि करीब 10 महीने की उम्र तक लगभग 25 प्रतिशत बच्चे किसी न किसी रूप में धोखे को समझने लगते हैं। यह संख्या 17 महीने की उम्र तक लगभग 50 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। वहीं तीन साल की उम्र तक कई बच्चे झूठ बोलने या बहाने बनाने में काफी कुशल हो जाते हैं। रिसर्च में यह भी सामने आया कि बच्चों में धोखे की शुरुआत बहुत छोटे और सरल रूपों से होती है। जैसे किसी बात को सुनकर भी अनसुना करने का नाटक करना, अपनी पसंदीदा चीज छिपा देना या मना की गई चीज को चोरी-छिपे खा लेना।

कई माता-पिता ने बताया कि उनके बच्चे ऐसी हरकतें बहुत कम उम्र में ही करने लगते हैं। एक मामले में तो एक माता-पिता ने बताया कि उनका लगभग आठ महीने का बच्चा भी शुरुआती स्तर का धोखा देने जैसा व्यवहार दिखा रहा था। प्रोफेसर होइका के अनुसार बच्चों का यह व्यवहार जानबूझकर किसी को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं होता, बल्कि यह अधिकतर परिस्थितियों से बचने या अपनी इच्छा पूरी करने की कोशिश होती है। उदाहरण के तौर पर बच्चा डांट से बचने के लिए बहाना बना सकता है या अपनी पसंद की चीज पाने के लिए चालाकी दिखा सकता है। जैसे-जैसे बच्चे की भाषा विकसित होती है और वह दूसरों के सोचने के तरीके को समझने लगता है, वैसे-वैसे उसके झूठ भी ज्यादा जटिल और रचनात्मक हो जाते हैं। अध्ययन में कुल 16 तरह के धोखे या भ्रामक व्यवहारों का उल्लेख किया गया है। इनमें अतिशयोक्ति करना, किसी गलती से इनकार करना, अनसुना करने का नाटक करना और चीजों को छिपाना जैसे तरीके शामिल हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि तीन साल की उम्र तक बच्चे ऐसे व्यवहार अधिक बार और कई अलग-अलग तरीकों से करने लगते हैं।

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