रूस के चुनाव में राष्ट्रपति Vladimir Putin का जबरदस्त दबदबा
- यूनाइटेड रशिया पार्टी ने रिकॉर्ड सीटें जीतकर रचा इतिहास
मॉस्को। रूस के संसदीय चुनाव में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की राजनीतिक पकड़ और उनका दबदबा एक बार फिर पूरी तरह से कायम साबित हुआ है। पुतिन के समर्थन वाली सत्तारूढ़ पार्टी ‘यूनाइटेड रशिया’ ने हाल ही में संपन्न हुए कड़े नियंत्रण वाले तीन दिवसीय संसदीय चुनाव में ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए भारी बहुमत हासिल किया है। रूस की चुनाव प्रमुख एला पामफिलोवा द्वारा जारी शुरुआती आधिकारिक नतीजों के अनुसार, चार सौ पचास सदस्यों वाली रूसी संसद यानी ‘स्टेट ड्यूमा’ में यूनाइटेड रशिया ने रिकॉर्ड तीन सौ पचपन सीटों पर शानदार जीत दर्ज की है। इस चुनाव में सत्ताधारी पार्टी को कुल सत्तावन दशमलव आठ तीन प्रतिशत वोट मिले, जिसके साथ ही उसने संसद में अब तक का अपना सबसे बड़ा सीट शेयर हासिल कर लिया है। इस प्रचंड जीत के बाद पार्टी के पास बिना किसी अन्य दल के समर्थन के संविधान में आवश्यक संशोधन करने के लिए पर्याप्त से अधिक ताकत और बहुमत मिल गया है, जिसे क्रेमलिन ने राष्ट्रपति पुतिन और उनकी नीतियों के प्रति जनता की गहरी एकजुटता और अटूट समर्थन का प्रमाण बताया है।
गौरतलब है कि फरवरी 2022 में यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने पर सैन्य कार्रवाई शुरू होने के बाद से यह देश में हुआ पहला बड़ा संसदीय चुनाव था, जिसमें उनसठ प्रतिशत से अधिक मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। चुनाव के अंतिम दिन राजधानी मॉस्को पर यूक्रेन के एक बड़े ड्रोन हमले के बावजूद चुनाव आयोग ने मतदान प्रक्रिया को पूरी तरह से सुरक्षित और सफल करार दिया। चुनाव परिणामों में विपक्षी दलों की स्थिति पर नजर डालें तो कम्युनिस्ट पार्टी चालीस सीटें हासिल कर दूसरे स्थान पर रही, जबकि राष्ट्रवादी एलडीपीआर को पच्चीस और न्यू पीपल्स पार्टी को बीस सीटें प्राप्त हुईं। दिलचस्प बात यह है कि इन सभी प्रमुख दलों ने यूक्रेन युद्ध समेत देश के तमाम बड़े नीतिगत मुद्दों पर आम तौर पर क्रेमलिन का ही समर्थन किया है। इसके अलावा, युद्ध के मैदान में सीधे सक्रिय रहे रूस के लगभग उनचास पूर्व सैनिक भी अब यूनाइटेड रशिया के टिकट पर सांसद के रूप में ड्यूमा में प्रवेश करने जा रहे हैं, जबकि चेचन्या क्षेत्र में पुतिन के बेहद करीबी सहयोगी रमजान कादिरोव को लगभग निन्यानवे प्रतिशत से अधिक भारी मतों के साथ दोबारा क्षेत्रीय नेता चुन लिया गया है।
दूसरी ओर, युद्ध-विरोधी रुख रखने वाली ‘याब्लोको’ पार्टी को संघीय संसद में तो कोई भी सीट हासिल नहीं हो पाई, लेकिन नोवगोरोड की क्षेत्रीय विधानसभा में उसने छह प्रतिशत से अधिक वोट पाकर पांच प्रतिशत की अनिवार्य सीमा को पार करने में जरूर सफलता हासिल की। हालांकि, इस पार्टी को संघीय चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था और इसके कई उम्मीदवारों को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था, जिसके चलते रूस के घरेलू विपक्ष और कई पश्चिमी देशों की सरकारों ने इन चुनावों की पारदर्शिता और तौर-तरीकों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। इसके बावजूद, इन व्यापक परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तमाम अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भी रूसी राजनीति में राष्ट्रपति पुतिन का प्रभाव और उनका राजनीतिक जलवा पूरी तरह से बरकरार है।
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